अंग्रेेजों की गुलामी से भारत माता को आजाद कराने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौजूदा हालात से खासे आहत हैं। दो आबा की सरजमीं के आजादी के मतवाले नायकों का दो टूक कहना है कि आजादी भले मिल गई है, लेकिन इस शब्द की सार्थकता अभी तक पूरी नहीं हो सकी है।
आज और कल की राजनीति की जमीन और आसमान से तुलना करने वाले फ्रीडम देश के मौजूदा हालात का कुसूरवार शासन और प्रशासन में बैठेे आला अफसरों के साथ नेताओं को करार देने में जरा सा भी गुरेज नहीं करते हैं।
वह चाहते हैं कि आजादी के 70 साल पूरे होने पर मनाए जाने वाले उत्सव से इतर देशहित के लिए काम किया जाए। आजादी के असल चेहरे को उजागर करती एक रिपोर्ट।बस में सीट मिलने के लाले, क्या यही आजादी के मायने
चौडगरा। बिंदकी तहसील के कल्याणपुर गांव निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विश्वनाथ खन्ना 87 साल के हैं। यह कच्चे मकान में गुजर बसर कर रहे हैं।कांग्रेस कार्यालय में अंग्रेज सेना के धावा बोलने की जानकारी पर साथियाें के साथ बिंदकी रोड, रेलवे स्टेशन में तोड़फोड़ और ट्रैक जाम कर लोहा लिया था। इस फ्रीडम फाइटर को आज के हालात रास नहीं आ रहे हैं। बकौल विश्वनाथ, आजादी के नायकों प्रति न नेताओं का नजरिया बेहतर है और न सरकारी व्यवस्था के पालकों का। कोई विभाग सुनता नहीं है। कहने को तो सरकारी बस में बकायदा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए आरक्षित सीट की व्यवस्था है लेकिन उस पर भी बैठने को नहीं मिलता।नहीं था गुमान आजादी का यह हश्र देखने को मिलेगा
खखरेरू। खागा तहसील के रक्षपालपुर में रहने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ईश्वरचंद्र राष्ट्र की तरक्की से खुश है, लेकिन देश के सरकारी और राजनैतिक सिस्टम अपेक्षानुरूप नहीं हैं।पहले सब कुछ त्याग कर भारत माता को गुलामी की दास्तां से आजाद कराने के लिए हर कोई उतावला रहता था। अब यह त्याग खत्म हो गया है। इसका स्थान स्वार्थ ने ले लिया है। तब लोग राष्ट्र के लिए जीते थे, समाज के लिए जीते थे। अब ऐसा नहीं है। हर भारतीय की जिम्मेदारी बनती है कि वह देश निर्माण में अपने स्तर से सहयोग करे। तभी सही मायने में आजादी शब्द की सार्थकता साबित हो सकेगी।आजादी को बना दिया गया नाम की-
बहुआ। सदर तहसील क्षेत्र के दुगरेई गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सनेही सिंह भी देश को मिली आजादी की हकीकत से आहत हैं। 15 अगस्त, 26 जनवरी और दो अक्टूबर जैसे राष्ट्रीय पर्वों तक सिमटी आजादी की चर्चा को रखते हुए फ्रीडम फाइटर इसे राष्ट्र के प्रति जवाबदेह न होना करार दिया। देश का किसान जिस प्रकार से समस्याओं से जूझ रहा है। पढ़ लिखकर डिग्री और डिप्लोमाधारी बड़ी तादाद में युवा एक नौकरी की तलाश में नजर आ रहे हैं।तमाम परिवारों को एक वक्त का भोजन मयस्सर नहीं है। जाहिर है कि हमें जो आजादी 70 साल पहले मिली है, उसे बरकरार रखने का काम नहीं किया गया। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि आज केवल मीडिया में जगह बनाने के लिए राष्ट्र हित की बात कुछ देर की जाती है और फिर उसे हमेशा की तरह बिसरा दिया जाता है। सच तो यह है कि कोई आजादी के संघर्ष को जानना ही नहीं चाहता है।
चौडगरा। तहसील क्षेत्र के गुनीर गांव में जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुरेंद्र बहादुर सिंह एक दशक पहले गांव छोड़कर कानपुर में जा बसे हैं, लेकिन उनका दिल हमेशा मातृभूमि में रहने वाले लोगों पर लगा रहता है। फ्रीडम फाइटर कहते हैं कि देश के युवाओं को अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। परिवार के बड़ों को चाहिए कि वह अपने बच्चों के जेहन में राष्ट्र प्रेम भी भरे।आजादी की लड़ाई के दौरान हर नौजवान का देश के लिए मर मिटने को घरों से निकल आया था। आज देश के लिए मर मिटना तो दूर आजादी के किस्से तक सुनाए जाने बंद हो गए हैं। बकौल सुरेंद्र बहादुर, सरकार को राष्ट्र प्रेम को बढ़ावा देने के प्रति कार्यक्रम चलाने चाहिए।थाने में हमला बोल कर फहराया तिरंगा
बिंदकी। नगर के जहानपुर मोहल्ला के 92 वसंत देख चुके स्वतंत्रता सेनानी श्याम गुप्ता ने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से जोरदार टक्टर ली। बकौल श्यामलाल 1940 के बाद देश में गर्दो गुबार का माहौल बन चुका था। हमारे हम उम्र युवा साथी आजादी के तराने गुनगुनाया करते थे। हम लोग गांधी चौराहा में बने रेलवे के टिकट घर पहुंचे। यहां पर एक मशीन लगी थी, टिकट लूटने के बाद तोड़फोड़ की गई।थाने में तैनात संगम लाल सिपाही को बंधक बनाकर सरकारी इमारत में तिरंगा फहराया दिया गया। कुछ दिनों बाद थाने में हमला बोल दिया, ईंट पत्थर चलाने के बाद मैं सेलावन गांव जा पहुंचा, जहां से पुलिस ने छह माह बाद गिरफ्तार कर लिया था। स्वतंत्रता सेनानी श्यामलाल कहते हैं कि आज के 68 वर्ष पहले जो बयार बहती थी, वह कुछ और ही थी।
हिंदू मुस्लिम एकता, आपसी भाईचारा के अलावा उस हवा में ईमानदारी थी। जो देश वासियों को प्रेम और सर्मपण के भावों से भरती थी। सरफरोशी की तमन्ना हर दिल में मचलती थी, लेकिन आज जब आंखों की रोशनी कमजोर हो चली है। उस समय देखता हूं तो सब कुछ बदल गया है। समाज जहां से शिक्षक, नेता, अधिकारी और अन्य लोग आते है उनका चाल, चेहरा और चरित्र पूरी तरह बदले हुए नजर आते हैं।
स्रोत साभार : अमर उजाला,
